नेपाल में धार्मिक नगरी जनकपुरधाम – सुंदरता गुम, संवेदना शून्य : कैलाश दास*


*रतन गुप्ता उप संपादक*

नेपाल के जनकपुरधाम सिर्फ मधेश प्रदेश की राजधानी नहीं, बल्कि धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से नेपाल की सबसे महत्वपूर्ण नगरी है। जानकी मन्दिर, राम मन्दिर, बौधिमाई मन्दिर, गंगासागर, धनुषसागर जैसे धार्मिक स्थलों से समृद्ध यह नगर हिन्दू आस्था का अत्यंत पवित्र केंद्र माना जाता है। लेकिन यह गरिमामयी नगर आज बदइंतजामी, संवेदनहीनता और जिम्मेदारियों के अभाव से ग्रस्त है। मुख्य मन्दिर क्षेत्र की पवित्रता और सुंदरता दिन–प्रतिदिन भंग हो रही है, परंतु स्थानीय सरकार और संबंधित निकाय चुप्पी साधे हुए हैं।
जनकपुरधाम की गरिमा को परखने का पहला पैमाना है—यहाँ की सड़कें, रोशनी, सफाई व्यवस्था और धार्मिक स्थलों का प्रबंधन। पर आज की स्थिति यह है कि नगर का चेहरा ही कुरूप दिखने लगा है। मन्दिर क्षेत्र के सौंदर्य को बिगाड़ने में सड़क किनारे लगी रेहड़ियाँ, फुटपाथ की दुकानें, खाद्य सामग्री की अव्यवस्थित बिक्री और यहाँ-वहाँ फेंका गया कूड़ा-करकट मुख्य कारण बन चुके हैं। जानकी मन्दिर, राम मन्दिर, बौधिमाई मन्दिर आदि जैसे पवित्र स्थलों को सुबह से शाम तक दर्जनों ठेलागाड़ियों ने घेर रखा होता है, जहाँ सैकड़ों लोग नाश्ता कर वहीं सड़कों पर जूठा और कूड़ा फेंक देते हैं।
और भी चिंताजनक बात यह है कि यह गंदगी और भीड़ पैदल चलने वालों, श्रद्धालुओं और वाहनों को भी कठिनाइयों में डाल देती है। कई बार ठेलों की भीड़, गंदगी और अव्यवस्थित सड़कों के कारण दुर्घटनाएँ तक हो चुकी हैं, फिर भी स्थानीय प्रशासन, उपमहानगरपालिका, पुलिस प्रशासन और नागरिक समाज चुप हैं। ऐसे में एक धार्मिक नगरी की मर्यादा की रक्षा कैसे हो सकती है?
नेपाल पत्रकार महासंघ के केन्द्रीय सदस्य राजेश कर्ण कहते हैं—
“धर्म के नाम पर श्रद्धालु गंगाजल छिड़ककर जनकपुरधाम में पूजा करने आते हैं, लेकिन उन्हें उसी पवित्र स्थान पर जूठे-कूड़े पर चलना पड़ता है। यह केवल जनकपुरधाम नहीं, पूरे देश के लिए शर्मनाक स्थिति है।”

कर्ण के अनुसार, मिथिला संस्कृति केवल नेपाल या भारत तक सीमित नहीं, यह पूरी दुनिया में पहचानी जाती है। ऐसे पवित्र स्थलों पर पर्यटक केवल भगवान के दर्शन के लिए नहीं आते, वे यहाँ के खानपान, पोशाक, भाषा, संस्कार, व्यवहार और नगर की व्यवस्था भी देखते हैं। लेकिन इन सभी पक्षों की स्थिति अस्त-व्यस्त है। पर्यटक प्रबंधन, धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने और सौंदर्य विकास के लिए जिम्मेदार स्थानीय सरकार स्वयं मौन है, और नगर के नागरिक भी उदासीन बने हुए हैं।
वरिष्ठ पत्रकार श्रीनारायण साह जोड़ते हैं—
“जनकपुरधाम उपमहानगरपालिका जैसे जिम्मेदार संस्थान को मठ–मंदिर और नगर की सुंदरता के प्रबंधन पर ध्यान देना चाहिए, लेकिन वह केवल ठेला हटाने के नाम पर दुकानें जब्त करने तक सीमित रह गया है। हिन्दी में एक कहावत है—‘बंदर के हाथ में लाठी’, यही स्थिति जनकपुरधाम में बन गई है। जिन्हें धार्मिक चेतना का बोध नहीं, उन्हीं के हाथ में नगर की चाबी सौंप दी गई है।”
जनकपुरधाम के गंगासागर, धनुषसागर जैसे पवित्र सरोवरों की सुरक्षा की बजाय उनके किनारे रेहड़ियाँ लगी हुई हैं। प्लास्टिक के पैकेट, खाने के जूठे डिब्बे, गैस सिलिंडर और कचरे के ढेर पवित्रता का मजाक बन चुके हैं। जहाँ धार्मिक कथाएँ अंकित होनी चाहिए थीं, जहाँ सांस्कृतिक चित्र सजने चाहिए थे, वहाँ अब गंदगी से भरे बोरे और उनमें बजते आधुनिक गीतों की आवाज व तले हुए पकवानों की गंध फैली हुई है। यदि नगर की चाबी थामे उपमहानगरपालिका ही यह हाल कर रही हो, तो प्रदेश सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाना बेमानी होगा। यह दृश्य साफ़ दर्शाता है कि दोनों सरकारें जनकपुरधाम की सौंदर्य, पर्यटन संभावनाओं और धार्मिक गरिमा की रक्षा को लेकर कितनी गंभीर हैं।
राज्य की चुप्पी, स्थानीय सरकार की लापरवाही और नागरिक समाज की निष्क्रियता के कारण जनकपुरधाम की प्रतिष्ठा तेज़ी से गिरती जा रही है। हमारा नगर—जनकपुरधाम—सिर्फ पूजा-पाठ का केंद्र नहीं, यह नेपाल की सांस्कृतिक धरोहर भी है। ऐसे नगर को व्यवस्थित करने के लिए व्यापक योजना, समन्वय, जागरूकता और अभियान जरूरी है। मठ–मंदिर क्षेत्र को धार्मिक सीमाओं के भीतर रखते हुए शांत, स्वच्छ और सुंदर बनाया जाना चाहिए। दुकानों को निर्धारित क्षेत्रों में स्थानांतरित करना चाहिए, कूड़ा प्रबंधन को प्राथमिकता देनी चाहिए, और दैनिक निगरानी प्रणाली विकसित करनी चाहिए।
यदि ऐसे प्रयास तुरंत शुरू नहीं किए गए, तो आने वाले कुछ वर्षों में जनकपुरधाम की गरिमा पर्यटकों की नजरों में धूमिल हो जाएगी। धार्मिक नगर की यह स्थिति देखकर नेपाल आने वाले श्रद्धालु स्वयं आहत होते हैं, जिससे उनका अनुभव निराशाजनक बन सकता है।
आज आवश्यकता है जनकपुरधाम को एक सच्चा धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक केंद्र बनाने के साझा संकल्प की, जिसमें सरकार, उपमहानगरपालिका, नागरिक समाज, युवा, पत्रकार, सुरक्षा संस्थान और समस्त जनकपुरवासी की जिम्मेदारी हो। नगर की गरिमा केवल मन्दिर की दीवारों से नहीं, उसके आसपास के वातावरण से तय होती है। सड़कें, लाइटें, कूड़ा प्रबंधन, श्रद्धालुओं की सुविधा, धार्मिक मर्यादा और पर्यटकों का स्वागत—इन सभी पक्षों को जोड़कर ही जनकपुरधाम की प्रतिष्ठा बचाई जा सकती है।
अभी भी समय है—समझने का, बदलने का और सहेजने का। जनकपुरधाम हमारी आस्था, इतिहास और पहचान है—इसे केवल देखना नहीं, संवारना भी हमारा कर्तव्य है

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