बस्ती। योग दर्शन में यमों का महत्वपूर्ण स्थान है। यम का दूसरा अंग ‘सत्य’ है, जिसका सूत्र महर्षि पतंजलि ने पातंजल योगदर्शन में स्पष्ट किया है —
“सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम्” (2/36)।
इस सूत्र का आशय बताते हुए योगाचार्य डॉ. नवीन सिंह ने कहा कि जब साधक सत्य में प्रतिष्ठित हो जाता है, तब उसके कर्मों का फल स्वतः उसके कथन से जुड़ जाता है।
उन्होंने बताया कि मन, वचन और कर्म से सत्य का पालन करना तथा मिथ्या का त्याग करना ही ‘सत्य’ कहलाता है। जैसा देखा, सुना और पढ़ा हो, वैसा ही कहना, बताना और लिखना सत्य का वास्तविक स्वरूप है। सच्चे मन से किया गया प्रत्येक कर्म श्रेष्ठ फल प्रदान करता है और व्यक्ति के आसपास के वातावरण को भी सकारात्मक, पवित्र एवं फलदायी बनाता है।
डॉ. नवीन सिंह ने कहा कि महर्षि पतंजलि के अनुसार सत्य की सिद्धि प्राप्त करने वाला व्यक्ति जैसा कहता है, वैसा ही घटित होने लगता है। यद्यपि सत्य को जीवन में धारण करना कठिन प्रतीत होता है, परंतु यह असंभव नहीं है। इसी कारण भारतीय संस्कृति में कहा गया है — “सत्यमेव जयते”।
उन्होंने बताया कि यमों की इस श्रृंखला में अगले क्रम में ‘अस्तेय’ का महत्व समझाया जाएगा। इसके लिए साधक एवं पाठक आगामी कड़ी में उनसे जुड़े रहें।
