बस्ती। अष्टांग योग के अंतर्गत यम का चौथा स्तंभ ब्रह्मचर्य है, जिसे लेकर समाज में अनेक भ्रांतियाँ प्रचलित हैं। अधिकांश लोग ब्रह्मचर्य को केवल शारीरिक संबंधों के पूर्ण त्याग से जोड़कर देखते हैं, जबकि पतंजलि योगदर्शन में इसका अर्थ कहीं अधिक व्यापक और गूढ़ बताया गया है।
योगाचार्य डॉ. नवीन सिंह ने ब्रह्मचर्य के वास्तविक स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए बताया कि योगसूत्र में कहा गया है— “ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः”, अर्थात ब्रह्मचर्य में प्रतिष्ठित होने पर साधक को अपार ऊर्जा और बल की प्राप्ति होती है। यह केवल शारीरिक संयम नहीं, बल्कि मन, वचन और कर्म—तीनों स्तरों पर संयम का अभ्यास है।
उन्होंने बताया कि ब्रह्मचर्य का आशय इंद्रियों के दमन से नहीं, बल्कि उनके संतुलित और मर्यादित उपयोग से है। मनुष्य अपनी इंद्रियों से भोजन करता है, देखता है, सुनता है और विभिन्न क्रियाएँ करता है, किंतु इन सबका उपयोग उतना ही किया जाए जितना आवश्यक हो। किसी भी विषय का अत्यधिक उपभोग या उसकी आदत बन जाना ब्रह्मचर्य के विपरीत है। इंद्रियों को विषयासक्ति से मुक्त रखना ही वास्तविक ब्रह्मचर्य है।
डॉ. सिंह के अनुसार, ब्रह्मचर्य का संबंध उर्ध्वरेता की अवस्था से है, जिसमें व्यक्ति अपनी कामेच्छा पर नियंत्रण रखते हुए ऊर्जा का संरक्षण करता है और उसे उच्च चेतना तथा पुरुषार्थ में नियोजित करता है। ऐसी स्थिति में साधक का मन बिखरता नहीं, बल्कि लक्ष्य की ओर केंद्रित रहता है। इससे अखंड और प्रचंड पुरुषार्थ करने की शक्ति प्राप्त होती है, जो आत्मविकास और साधना के लिए अत्यंत आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि ब्रह्मचर्य का पालन केवल संन्यासियों के लिए नहीं, बल्कि गृहस्थ जीवन जीने वाले व्यक्तियों के लिए भी समान रूप से उपयोगी है। संयमित जीवनशैली अपनाकर व्यक्ति मानसिक शांति, शारीरिक स्वास्थ्य और आत्मिक बल प्राप्त कर सकता है।
कार्यक्रम के अंत में डॉ. नवीन सिंह ने बताया कि अष्टांग योग के अगले यम अपरिग्रह पर विस्तार से चर्चा आगामी दिवस की जाएगी, जिसमें संग्रह और आसक्ति से मुक्ति के योगिक दृष्टिकोण को समझाया जाएगा।
