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अष्टांग योग में आसन का महत्व : शरीर व मन की स्थिरता का सशक्त माध्यम – डॉ नवीन सिंह

बस्ती। अष्टांग योग के आठ सोपानों में यम और नियम के पश्चात तीसरा सोपान आसन है, जिसका उद्देश्य शरीर और मन में स्थिरता एवं सुख की स्थापना करना है। महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र में आसन की परिभाषा देते हुए कहा है— “स्थिर सुखमासनम्”, अर्थात जिस स्थिति में शरीर को स्थिर एवं सुखपूर्वक कुछ समय तक रखा जा सके, वही आसन कहलाता है।
योगाचार्य डॉ नवीन सिंह ने बताया हठयोग परंपरा में कहा गया है कि चौरासी लाख योनियों के अनुरूप चौरासी लाख आसन संभव हैं, किंतु व्यवहार में मुख्य रूप से 84 आसनों का ही वर्णन मिलता है। योगाचार्यों के अनुसार आसनों के नियमित अभ्यास से शरीर में स्थिरता आती है और मन एकाग्र होता है। मन के स्थिर होते ही नकारात्मक विचारों पर नियंत्रण स्थापित होने लगता है तथा सकारात्मक विचारों का उद्भव होता है। इससे चित्त की वृत्तियों पर संयम आता है और साधक आत्मस्वरूप में स्थित होने लगता है।
डॉ नवीन सिंह ने बताया कि आसन सिद्ध होने पर अनेक शारीरिक रोगों से निवृत्ति होती है और मन योग-साधना में प्रवृत्त हो जाता है। शरीर एवं मन की स्थिरता के लिए बैठकर किए जाने वाले प्रमुख आसनों में सुखासन, स्वस्तिकासन, पद्मासन, वज्रासन, मंडूकासन एवं शशकासन शामिल हैं। इसी प्रकार खड़े होकर किए जाने वाले ताड़ासन, ध्रुवासन, वृक्षासन एवं तिर्यक ताड़ासन तथा पेट के बल लेटकर किए जाने वाले मकरासन, भुजंगासन, शलभासन और विपरीत नौकासन अत्यंत लाभकारी माने गए हैं। पीठ के बल लेटकर किए जाने वाले उत्तानपादासन, हलासन, मर्कटासन, पादवृत्तासन एवं द्विचक्रिकासन भी शरीर को सुदृढ़ और मन को शांत करने में सहायक हैं।
योगाचार्यों का कहना है कि आसनों का नियमित अभ्यास न केवल शारीरिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ करता है, बल्कि मानसिक संतुलन एवं आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग भी प्रशस्त करता है।

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