बस्ती: योग दर्शन में अष्टांग योग का विशेष महत्व है। महर्षि पतंजलि द्वारा प्रतिपादित अष्टांग योग के आठ अंगों में पहला अंग यम है। यम के पाँच उपविभाग—अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह—मानव जीवन को नैतिक, संयमित और संतुलित बनाने की दिशा दिखाते हैं। इनमें यम का पाँचवाँ अंग अपरिग्रह आज के भौतिकतावादी युग में अत्यंत प्रासंगिक है।
इंडियन योग एसोसिएशन उत्तर प्रदेश चैप्टर के अध्यक्ष (पूर्वी जोन) योगाचार्य डॉ नवीन सिंह ने बताया कि अपरिग्रह का शाब्दिक अर्थ है आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना। इसका आशय यह है कि व्यक्ति धन, वस्तु, साधन या संसाधनों का अनावश्यक संचय न करे तथा मन, वचन और कर्म से लोभ, लालच एवं अनियंत्रित इच्छाओं का त्याग करे। अपरिग्रह केवल बाहरी वस्तुओं तक सीमित नहीं है, बल्कि विचारों और भावनाओं के संयम से भी जुड़ा हुआ है।
योग दर्शन के अनुसार जब साधक संग्रह की प्रवृत्ति से मुक्त होता है, तब उसका मन हल्का और शांत हो जाता है। पतंजलि योगसूत्र में कहा गया है— “अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथंतासंबोधः” अर्थात अपरिग्रह में स्थिर होने पर व्यक्ति को अपने जीवन और अस्तित्व का गहरा बोध होता है।
अपरिग्रह का पालन करने से व्यक्ति में संतोष की भावना विकसित होती है। इससे मानसिक तनाव, चिंता और असंतोष में कमी आती है। भौतिक लालसाओं से दूरी बनाकर जीवन सरल और सहज बनता है। सामाजिक स्तर पर अपरिग्रह समानता, सद्भाव और सहयोग को बढ़ावा देता है। आवश्यकता से अधिक संग्रह न होने पर संसाधनों का न्यायसंगत वितरण संभव होता है, जिससे शोषण और असमानता कम होती है।
डॉ नवीन सिंह ने बताया कि आध्यात्मिक दृष्टि से अपरिग्रह ध्यान और साधना में एकाग्रता बढ़ाता है। मानसिक शांति का सकारात्मक प्रभाव शारीरिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। इस प्रकार अपरिग्रह व्यक्ति को संयम, संतोष और शांति का मार्ग दिखाता है, जो आज के समय में अत्यंत आवश्यक है।
