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भारत नेपाल को कितनी आर्थिक सहायता देगा? क्या 2 अरब डॉलर के पैकेज के लिए हो रही है बालेन शाह की भारत यात्रा ?

*रतन गुप्ता उप संपादक*
भारत नेपाल को कितनी आर्थिक सहायता देगा? क्या 2 अरब डॉलर के पैकेज के लिए हो रही है बालेन शाह की भारत यात्रा ?

नेपाल की नजर 2 अरब डॉलर से अधिक की सहायता पर, लेकिन भारत की मंजूरी, ऋण की शर्तें और पुराने समझौतों का अनुभव तय करेगा यात्रा की वास्तविक सफलता

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह की प्रस्तावित भारत यात्रा को लेकर कूटनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। इस यात्रा से नेपाल को आर्थिक सहायता, बुनियादी ढांचे के विकास, बाढ़ से क्षतिग्रस्त क्षेत्रों के पुनर्निर्माण और ऊर्जा सहयोग के क्षेत्र में बड़ी उम्मीदें हैं। नेपाल सरकार भारत से 2 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक का आर्थिक सहायता पैकेज मांगने की तैयारी में है। इसमें एक अरब डॉलर से अधिक का रियायती ऋण, 50 करोड़ डॉलर का अनुदान तथा भोटेकोशी क्षेत्र में बाढ़ से क्षतिग्रस्त बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण के लिए अतिरिक्त 50 करोड़ डॉलर की मांग शामिल है।नेपाल के काठमांडू पोस्ट की 4 नवंबर की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री की नेपाल यात्रा के दौरान इस प्रस्ताव पर प्रारंभिक चर्चा होने की संभावना है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत नेपाल की इस पूरी मांग को स्वीकार करेगा ? क्या प्रधानमंत्री शाह की भारत यात्रा मुख्य रूप से आर्थिक सहायता हासिल करने के लिए हो रही है, या इसके पीछे ऊर्जा, व्यापार, कनेक्टिविटी और लंबित राजनीतिक मुद्दों को आगे बढ़ाने की व्यापक रणनीति भी है?

2 अरब डॉलर की मांग: नेपाल किस काम के लिए चाहता है पैसा ?
नेपाल की प्रस्तावित सहायता मांग को तीन प्रमुख हिस्सों में समझा जा सकता है।

पहला, एक अरब डॉलर से अधिक का रियायती ऋण। नेपाल इस राशि का उपयोग बिजली प्रसारण लाइनों के निर्माण और दूसरी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए करना चाहता है। बिजली उत्पादन की बढ़ती संभावनाओं के बीच नेपाल के लिए पर्याप्त ट्रांसमिशन नेटवर्क तैयार करना महत्वपूर्ण है, ताकि देश के भीतर बिजली की आपूर्ति मजबूत हो और अतिरिक्त बिजली के निर्यात की क्षमता भी बढ़े।

दूसरा, सिद्धार्थ राजमार्ग के उन्नयन के लिए 50 करोड़ डॉलर का अनुदान। यह राजमार्ग भारत की सुनौली सीमा को पोखरा से जोड़ता है। इसके उन्नयन से पर्यटन, व्यापार और माल परिवहन को लाभ मिल सकता है। नेपाल के लिए इस परियोजना का महत्व केवल सड़क निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत से आने वाले पर्यटकों और व्यापारिक गतिविधियों के लिए भी महत्वपूर्ण है।

तीसरा, भोटेकोशी में बाढ़ से क्षतिग्रस्त बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण के लिए 50 करोड़ डॉलर। नेपाल को प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित सड़कों, पुलों और अन्य संरचनाओं की मरम्मत तथा पुनर्स्थापना के लिए अतिरिक्त संसाधनों की जरूरत है।

इस प्रकार नेपाल का प्रस्ताव केवल सामान्य बजटीय सहायता का अनुरोध नहीं है। सरकार इसे विकास परियोजनाओं और आपदा के बाद पुनर्निर्माण की जरूरतों से जोड़कर पेश करना चाहती है। हालांकि, यह पूरी राशि अभी भारत की ओर से स्वीकृत सहायता नहीं है; यह नेपाल की प्रस्तावित मांग है।


क्या भारत पूरी रकम देने को तैयार होगा?की नहीं ?
इस प्रश्न का उत्तर अभी स्पष्ट नहीं है। 4 और 5 नवंबर को काठमांडू में भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री की प्रस्तावित आधिकारिक यात्रा को प्रधानमंत्री शाह की भारत यात्रा की तैयारियों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। नेपाल के विदेश सचिव अमृतबहादुर राय के साथ उनकी बातचीत में द्विपक्षीय संबंधों, प्राथमिकता वाली परियोजनाओं और संभावित सहयोग पर चर्चा होनी है। लेकिन इस चरण में किसी निश्चित आर्थिक पैकेज की घोषणा को तय मानना उचित नहीं होगा।

भारत के सामने भी कई पहलू होंगे। किसी बड़े सहायता पैकेज पर निर्णय लेते समय परियोजनाओं की व्यवहार्यता, वित्तीय व्यवस्था, कार्यान्वयन की क्षमता, ऋण की शर्तें और दोनों देशों के आर्थिक हित महत्वपूर्ण होंगे। नेपाल की मांग में अनुदान और ऋण दोनों शामिल हैं, इसलिए यह जरूरी नहीं कि भारत हर मद को एक ही तरीके से स्वीकार करे।

संभावना यह भी है कि भारत कुछ परियोजनाओं को प्राथमिकता दे, कुछ के लिए सीमित सहायता मंजूर करे और बाकी प्रस्तावों पर आगे बातचीत जारी रखे। यह एक संभावित परिदृश्य है, भारत का घोषित निर्णय नहीं।

नेपाल के लिए वास्तविक सफलता का पैमाना केवल यह नहीं होगा कि यात्रा के दौरान कितने डॉलर की घोषणा होती है। यह भी देखना होगा कि सहायता कितनी राशि में स्वीकृत होती है, उसका कितना हिस्सा अनुदान है, ऋण की शर्तें क्या हैं और परियोजनाओं पर काम कब शुरू होता है।

पुराने ऋण की कहानी: घोषणा हुई, लेकिन पूरा लाभ क्यों नहीं मिला ?
नेपाल के सामने सबसे महत्वपूर्ण चुनौती भारत से नई सहायता मांगना ही नहीं, बल्कि पहले से घोषित सहायता का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित करना भी है।

भारत ने 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेपाल यात्रा के दौरान विकास परियोजनाओं के लिए 10,000 करोड़ नेपाली रुपये के रियायती ऋण की घोषणा की थी। इसके बाद 2015 के भूकंप के बाद पुनर्निर्माण के लिए भारत ने एक अरब अमेरिकी डॉलर की सहायता प्रतिबद्धता घोषित की थी। इसमें अनुदान और ऋण दोनों शामिल थे। भारतीय विदेश मंत्रालय के दस्तावेजों में इन सहायता प्रतिबद्धताओं और संबंधित ऋण व्यवस्थाओं का विवरण उपलब्ध है।

हालांकि, इन व्यवस्थाओं का उपयोग अपेक्षा के अनुरूप नहीं हो सका। नेपाल के पूर्व राजदूत शंकर शर्मा के अनुसार, भारतीय सामग्री, तकनीशियनों, इंजीनियरों और मशीनरी के उपयोग से जुड़ी शर्तों ने रियायती ऋण के इस्तेमाल को कठिन बनाया। इसका अर्थ है कि केवल कम ब्याज वाला ऋण उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं है; उसकी शर्तें भी नेपाल की परियोजनाओं और स्थानीय क्षमता के अनुकूल होनी चाहिए।

यही कारण है कि प्रधानमंत्री शाह की यात्रा में पुरानी ऋण व्यवस्थाओं के उपयोग का प्रश्न भी महत्वपूर्ण रहेगा। यदि नेपाल नई सहायता के लिए सहमति हासिल कर लेता है, लेकिन परियोजनाओं के चयन, खरीद प्रक्रिया और कार्यान्वयन में पुराने अवरोध बने रहते हैं, तो घोषित राशि का पूरा लाभ उठाना फिर कठिन हो सकता है।

इसलिए काठमांडू को इस बार केवल सहायता की घोषणा नहीं, बल्कि ऐसी व्यावहारिक व्यवस्था पर जोर देना चाहिए जिससे धन का समय पर उपयोग हो और परियोजनाएं निर्धारित अवधि में पूरी की जा सकें।

क्या बालेन शाह की यात्रा केवल आर्थिक सहायता के लिए है ?
नहीं। आर्थिक सहायता इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य जरूर है, लेकिन प्रस्तावित एजेंडा इससे कहीं व्यापक दिखाई देता है।

नेपाल और भारत के बीच ऊर्जा, सड़क, रेल, सीमा प्रबंधन, व्यापार और पारवहन से जुड़े विषयों पर चर्चा की तैयारी है। भारत के सहयोग से निर्मित कुछ परियोजनाओं का उद्घाटन और नई परियोजनाओं का शिलान्यास भी यात्रा के संभावित कार्यक्रमों में शामिल हैं। इनमें नेपाल पुलिस प्रतिष्ठान, भैरहवा की एकीकृत जांच चौकी और महाकाली नदी पर पुल जैसी परियोजनाओं का उल्लेख किया गया है।

ऊर्जा क्षेत्र में पश्चिम सेती की 750 मेगावाट, फुकोट कर्णाली की 480 मेगावाट और सेती नदी-6 की 450 मेगावाट परियोजनाओं पर भी चर्चा की संभावना है। इन परियोजनाओं में भारत की सरकारी कंपनी एनएचपीसी की भागीदारी है। यदि इनके कार्यान्वयन में ठोस प्रगति होती है, तो नेपाल को निवेश, बिजली उत्पादन और संभावित निर्यात से दीर्घकालीन लाभ मिल सकता है।

इसके अतिरिक्त, सिलिगुड़ी से झापा तक पेट्रोलियम पाइपलाइन विस्तार, दोधारा चांदनी में एकीकृत जांच चौकी, अयोध्या-जनकपुर रेल संपर्क तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में सहयोग जैसे विषय भी संभावित एजेंडे का हिस्सा हैं।

इस लिहाज से यात्रा को केवल वित्तीय सहायता जुटाने का अभियान मानना अधूरा होगा। यह दोनों देशों के आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को आगे बढ़ाने का अवसर भी है।

सीमा विवाद और हवाई मार्ग जैसे मुद्दे भी रहेंगे महत्वपूर्ण
भारत-नेपाल संबंधों में सहयोग के साथ कुछ पुराने विवाद भी मौजूद हैं। सीमा विवाद, नेपाल के लिए अतिरिक्त हवाई प्रवेश मार्ग, पंचेश्वर बहुउद्देश्यीय परियोजना तथा व्यापार और पारवहन से जुड़े मुद्दे दोनों देशों के बीच लंबे समय से चर्चा में रहे हैं। इन विषयों पर प्रगति भी यात्रा के परिणामों का महत्वपूर्ण हिस्सा होगी।

नेपाल की कूटनीतिक चुनौती यह होगी कि वह आर्थिक सहयोग को आगे बढ़ाते हुए अपने राष्ट्रीय हितों से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर भी सार्थक संवाद कायम रखे। भारत के लिए भी यह यात्रा अपने पड़ोसी देश के साथ संबंधों में विश्वास और विकास साझेदारी को मजबूत करने का अवसर हो सकती है।

हालांकि, इन सभी मुद्दों का एक ही यात्रा में समाधान निकलने की उम्मीद करना व्यावहारिक नहीं होगा। कुछ विषयों पर सहमति बन सकती है, जबकि अन्य पर आगे तकनीकी और राजनीतिक बातचीत की आवश्यकता होगी।
नेपाल को क्या प्राथमिकता देनी चाहिए?
नेपाल सरकार के सामने तीन स्पष्ट प्राथमिकताएं होनी चाहिए।

पहली, सहायता पैकेज में अनुदान और रियायती ऋण का संतुलन। बाढ़ से क्षतिग्रस्त बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण जैसी जरूरतों के लिए अनुदान विशेष रूप से उपयोगी होगा, क्योंकि इससे भविष्य में ऋण चुकाने का बोझ नहीं बढ़ता। वहीं, बिजली प्रसारण और राजमार्ग जैसी दीर्घकालीन परियोजनाओं के लिए उचित शर्तों वाला ऋण उपयोगी हो सकता है।

दूसरी, पुरानी सहायता व्यवस्थाओं की समस्याओं का समाधान। परियोजनाओं के चयन, खरीद, स्थानीय सामग्री के उपयोग और कार्यान्वयन संबंधी प्रक्रियाओं को व्यावहारिक बनाना आवश्यक है। इससे भविष्य में घोषित सहायता को वास्तविक विकास में बदला जा सकेगा।

तीसरी, सहायता के साथ निवेश और बाजार तक पहुंच पर जोर। नेपाल को भारत से केवल वित्तीय सहायता ही नहीं, बल्कि जलविद्युत निवेश, बिजली व्यापार, बेहतर परिवहन संपर्क और नेपाली उत्पादों के लिए बाजार तक पहुंच बढ़ाने की दिशा में भी ठोस प्रगति की कोशिश करनी चाहिए।

इसके साथ ही नेपाल को जापान, दक्षिण कोरिया और बहुपक्षीय विकास संस्थाओं सहित अन्य संभावित साझेदारों के साथ भी पुनर्निर्माण और विकास वित्तपोषण के विकल्प खुले रखने चाहिए। पूर्व अर्थमंत्री रामेश्वर खनाल ने भी अनुदान के घटते वैश्विक रुझान के बीच दूसरे दाताओं से सहयोग लेने की जरूरत पर जोर दिया है।

निष्कर्ष: सफलता का पैमाना 2 अरब डॉलर की घोषणा नहीं, उसका वास्तविक उपयोग होगा
प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह की प्रस्तावित भारत यात्रा नेपाल के लिए आर्थिक और कूटनीतिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। 2 अरब डॉलर से अधिक की सहायता मांग देश की बुनियादी ढांचा संबंधी जरूरतों और बाढ़ के बाद पुनर्निर्माण की चुनौती को दर्शाती है। लेकिन भारत इस पूरी मांग को स्वीकार करेगा या नहीं, कितना अनुदान देगा और कितना ऋण, इसका फैसला बातचीत और परियोजनाओं के मूल्यांकन के बाद ही स्पष्ट होगा।

यदि इस यात्रा के दौरान आर्थिक सहायता पर ठोस सहमति बनती है, पुराने ऋणों के उपयोग की बाधाएं दूर करने का रास्ता निकलता है और ऊर्जा, सड़क तथा व्यापार की परियोजनाओं में समयबद्ध प्रगति सुनिश्चित होती है, तो इसे नेपाल के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा सकता है।

इसके विपरीत, यदि यात्रा केवल बड़ी घोषणाओं तक सीमित रहती है और उनके कार्यान्वयन की स्पष्ट व्यवस्था नहीं बनती, तो अपेक्षित लाभ अधूरा रह सकता है।

अंततः सवाल यह नहीं है कि भारत नेपाल को कितनी बड़ी रकम देने की घोषणा करता है। असली सवाल यह है कि नेपाल उस सहयोग को कितनी कुशलता से वास्तविक विकास, बेहतर बुनियादी ढांचे और आम नागरिकों के जीवन में सुधार में बदल पाता है। यही प्रधानमंत्री बालेन शाह की भारत यात्रा की वास्तविक सफलता का पैमाना होगा।

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